12 की उम्र में बाल- विवाह,13 की उम्र में बलात्कार और माँ बनी बंगाल की एक ‘कामवाली बाई’ आज हैं ”विश्व की प्रसिद्ध लेखिका”

0
913

आज हम आपको एक ऐसी महिला की कहानी बताने जा रहें हैं जिसके पिता ने कुछ पैसों के लालच में अपनी बेटी का महज 12 साल की उम्र में उसकी उम्र के दोगुने से भी अधिक उम्र के व्यक्ति से उसका बाल विवाह करा दिया। विवाह के बाद उसकी ज़िन्दगी नर्क बन गयी ,उसके पति ने उसके साथ वैवाहिक बलात्कार किया और मात्र 13 साल की उम्र में उसे माँ बनने पर मजबूर कर दिया। उसके पति ने उसका शारीरिक और मानसिक इतना शोषण किया कि उस महिला को अपना घर छोड़कर अपने बच्चों का भूखा पेट भरने के लिए एक कामवाली बाई का काम करने पर मजबूर होना पड़ा। इतने दर्द और मुसीबत झेलने के बाद भी आज ये महिला विश्व की प्रसिद्ध लेखिका बन गयी है ! कैसे? जानिये एक साधारण सी महिला का असाधारण सफर।

माँ दुर्गा की नगरी बंगाल में जन्मी ये महिला ”बेबी हलदर” जिसकी माँ उसे बचपन में ही छोड़ कर चली गयी थी और उसके पिता ने ही उसको पाला पर काफी प्रताड़ित करने के साथ। बेबी जब सातवी कक्षा की पढ़ाई पूरी कर रही थी तब उसके पिता ने कुछ पैसों के लालच में और अपना पीछा छुड़ाने की खातिर बेबी की शादी उसकी उम्र के दोगुने से भी अधिक व्यक्ति से कर दी। सोच कर हैरानी भी होती है और गुस्सा भी आता है कि कैसी माँ थी जो अपनी ही बेटी को नर्क में छोड़ गयी ,कैसा पिता था वो जिसने अपनी बेटी को एक नर्क से दूसरे नर्क में फेंक दिया।

मात्र 12 वर्ष की बेबी शादी के मायने तक नहीं जानती थी ,पर उसे लगा कि शायद जिससे उसकी शादी हुई है वो उसका अच्छा दोस्त बनेगा पर उसकी मासूमियत तब खत्म हो गयी जब उसके पति ने बच्चे की ख्वाहिश से एक बच्ची का बचपन खत्म कर दिया। उसके पति ने मात्र 13 साल की उम्र में उसका वैवाहिक बलात्कार किया और उस बच्ची को माँ बनने पर मजबूर किया।

एक ऐसी लड़की जो खुद अभी बच्ची थी ऐसी उम्र में वो खुद एक बच्चे की माँ बनी। पर बेबी के दर्द का सफर खत्म नहीं हुआ उसका पति उसे हर रोज शारीरिक और मानसिक प्रताड़ित करता। पर जब बेबी के दर्द झेलने की सीमा खत्म हो गयी और उसके सब्र का बांध टूट गया तो उसने अपने पति का साथ और घर छोड़ने का फैसला किया बेबी के फैसले को सुनकर उसके पति ने उसके बच्चों को भी रखने से इंकार कर दिया। कैसा लगता है ये जानकर जिस देश में आजकल तलाक होने पर पति को भारी हर्ज़ाना देना पड़ता है और ताउम्र गुजारा भत्ता भी देना पड़ता है ,वैसे देश में बेबी के पति ने उसको उसका सामान तक घर से नहीं ले जाने दिया।

घर से बेघर हुई बेबी के पास खाने को कुछ भी नहीं था ,रहने को छत नहीं थी पर अब उसके पास दुःख भी नहीं था।

बंगाल से निकल कर बेबी दिल्ली आ गयी और अपने बच्चों का पेट भरने के लिए घरों में कामवाली का काम करने लगी। उसके इस काम से उसके बच्चों को खाने के साथ -साथ शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हो पाया।
पर बेबी की ज़िन्दगी में तब मोड़ आया जब उसे गुड़गांव जो अब गुरग्राम है वहां भाग्यवश मुंशी प्रेमचंद्र के पोते प्रमोद कुमार के घर पर काम करने का मौका मिला। बेबी आम घरों की तरह ही उस घर में भी काम करने लगी पर प्रमोद कुमार को कुछ आभास हुआ कि कुछ ऐसा है जो बेबी कहना चाहती है ,कोई ऐसी कहानी है जिसे वो दुनिया को बताना चाहती है।

बेबी की ज़िन्दगी की कहानी सुनकर उन्हें ऐसा लगा कि बेबी की कहानी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बनेगी जो हार कर आत्महत्या तक कर लेते हैं।

प्रमोद कुमार ने बेबी को लिखने के लिए प्रोत्साहित किया और उनके प्रोत्साहन का परिणाम तब बेबी को प्राप्त हुआ जब उसकी पहली ही किताब ‘‘आलो आंधारी ” को लोगों ने काफी सरहाया और वो एक लेखिका के तौर पर लाखों लोगों के लिए प्रशंसा की पात्र बनी।

उसके बाद बेबी को अपनी ज़िन्दगी को देखने का नया नजरिया और जीने का हौसला मिला। उसके बाद उनकी लिखी किताबों को पाठकों ने इतना पसंद किया कि जिसकी वजह से उनके किताबों के पब्लिशिंग हाउस ने यहां तक कह दिया कि ” चाहे हमें कितना ही नुकसान क्योँ ना हो जाए पर हम इनकी हर एक कहानी हमेशा पब्लिश करते रहेंगे। अपनी किताबों से उन्हें अच्छे खासे पैसे भी मिले पर उन सारे पैसों को उन्होंने अपने बच्चों के भविष्य के लिए निवेश कर दिया।
आपको जानकर हैरानी होगी की जिस लड़की ने सातवीं कक्षा तक भी पढ़ाई नहीं की वो कैसे इतनी बड़ी लेखिका बन गयी पर सच ये है कि लिखने के लिए पढ़ाई नहीं बल्कि संवेदना, सच्चाई और ज़िन्दगी देखने का नजरिया होना चाहिए ,फिर मन के भाव खुदबखुद शब्दों में परिवर्तित होने लगतें हैं। पर इनकी इस कामयाबी का श्रेय प्रमोद कुमार को भी जाता हैं जिन्होंने बेबी को पहचाना और एक नयी पहचान बनाने का भरोसा और सहारा दिया।

आपको जानकार हैरानी होगी कि इतनी प्रसिद्ध लेखिका बन जाने के बावजूद भी आज भी बेबी लोगों के घर पर कामवाली का भी काम कर रही हैं। बेबी का कहना है कि ”मै उन लोगों को कैसे छोड़ दूँ जिन्होंने मेरे दुःख में एक अहम भूमिका निभायी थी।”

अभी हाल ही में बेबी हलदार की नयी किताब ” घरे फरार पथ ” भी प्रकाशित हुई जिसे भी लोगों ने काफी पसंद किया पर उनका सफर इतना आसान नहीं था कई परेशानियां झेलकर ही आज वो इस मुकाम पर पहुंची है। पर सच में सभी को गर्व है ऐसी महिला पर जो एक कामवाली से विश्व प्रसिद्ध लेखिका बन पायी।