रामायण और महाभारत के ये महानायक आज भी हिमालय में बसते हैं

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    Ramayan, Mahabharat, Kripacharya, Ashwathama, Hanuman, Parshuram, vyas

    कहा जाता है, जो पैदा हुआ है वो एक दिन मरेगा। इस धरती में किसी को अमरत्व नहीं मिला। धरती पर हर चीज नश्वर है। मगर कुछ मान्यताएं हैं जिसके मुताबिक महाभारत और रामायण काल के कई पात्र आज भी जीवित हैं। यह सब किसी न किसी वचन, नियम या श्राप से बंधे हुए हैं और यह सभी दिव्य शक्तियों से संपन्न है। योग में जिन अष्ट सिद्धियों की बात कही गई है वे सारी शक्तियां इनमें विद्यमान है।

    अश्वत्थामा

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    कहा जाता है महाभारत काल से अश्वथामा आज भी पृथ्वी पर अपनी मुक्ति के लिए भटक रहा है। द्वापरयुग में जब कौरव व पांडवों में युद्ध हुआ था, तब अश्वत्थामा ने कौरवों का साथ दिया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने ही ब्रह्मास्त्र चलाने के कारण अश्वत्थामा को चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था।

    विभीषण

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    रामायण में विभीषण का नाम तो सुना ही होगा। रावण के छोटे भाई विभीषण श्रीराम के अनन्य भक्त थे। जब रावण ने माता सीता अपहरण किया था, तब विभीषण ने रावण को बहुत समझाया था। इस बात पर रावण ने विभीषण को लंका से निकाल दिया था। विभीषण श्रीराम की सेवा में चले गए और रावण के अधर्म को मिटाने में धर्म का साथ दिया। ये भी अमर माने जाते हैं।

    परशुराम

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    भगवान विष्णु के छठें अवतार परशुराम को भी जीवित बताया जाता है। परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका ने पांच पुत्रों को जन्म दिया। जिनके नाम क्रमशः वसुमान, वसुषेण, वसु, विश्वावसु तथा राम रखे गए। परशुराम ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए तप किया था। शिवजी ने प्रसन्न होकर अपना फरसा दिया था। परशुराम ने 21 बार पृथ्वी से समस्त क्षत्रिय राजाओं का अंत किया था। इसी वजह से राम परशुराम कहलाने लगे। पराशुराम भगवान राम के पूर्व हुए थे, लेकिन वे चिरंजीवी होने के कारण राम के काल में भी थे।

    हनुमान

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    हनुमान को भी अमरता का वरदान मिला हुआ है। हनुमान राम भगवान के परम भक्त रहे हैं। हजारों वर्षों बाद महाभारत काल में भी जीवित थे। सीता ने हनुमान को लंका की अशोक वाटिका में राम का संदेश मिलने के बाद आशीर्वाद दिया था कि वे अमर रहेंगे।

    बलि

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    महादानी बलि ने देवताओं को परास्त कर इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया था। लेकिन महादानी के रूप में राजा बलि के दान के लिए जाना जाता है। राजा बलि का घमंड गिराने के लिए भगवान ने ब्राह्मण का भेष धारण कर राजा बलि की परीक्षा ली। और उनसे तीन पग धरती दान में मांगी थी। राजा बलि ने उनकी इच्छा से तीन पग जमीन देने को तैयार हुए। तब भगवान ने विराट रूप धर दो पगों में तीनों लोक नाप लिए। जिसके बाद तीसरा पग बलि ने अपने सिर पर रखने को कहा जिसके बाद वो पाताल लोक चले गए। राजा बलि से श्रीहरि अतिप्रसन्न थे। इसी वजह से श्री विष्णु राजा बलि के द्वारपाल भी बन गए थे।

    ऋषि व्यास

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    ऋषि व्यास चारों वेद ऋग्वेद, अथर्ववेद, सामवेद और यजुर्वेद का ज्ञान था। सभी 18 पुराणों, महाभारत और श्रीमद्भागवत् गीता की रचना की थी। वेद व्यास, ऋषि पाराशर और सत्यवती के पुत्र थे। इनका जन्म यमुना नदी के एक द्वीप पर हुआ था और इनका रंग सांवला था। इसी कारण ये कृष्ण द्वैपायन कहलाए। इनकी माता ने बाद में शान्तनु से विवाह किया, जिनसे उनके दो पुत्र हुए, जिनमें बड़ा चित्रांगद युद्ध में मारा गया और छोटा विचित्रवीर्य संतानहीन मर गया। जिसके बाद इन्होंने ही वंश का आगे बढ़ाया। मान्यताओं के अनुसार ये भी कई युगों से जीवित हैं।

    कृपाचार्य

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    कृपाचार्य अश्वथामा के मामा और कौरवों के कुलगुरु थे। महाभारत युद्ध में कृपाचार्य कौरवों की ओर से सक्रिय थे। कृप और कृपि का जन्म महर्षि गौतम के पुत्र शरद्वान के वीर्य के सरकंडे पर गिरने के कारण हुआ था। ये भी आदिकाल तक जीवित रहे।

    ऋषि मार्कण्डेय

    ऋषि मार्कण्डेय भगवान शिव के परम भक्त थे। ऋषि ने शिवजी को तप कर प्रसन्न किया और महामृत्युंजय मंत्र को सिद्धि किया। महामृत्युंजय मंत्र का जाप कर ऋषि मार्कण्डेय ने इस मन्त्र को सिद्ध किया था इसलिए इन सातो के साथ साथ ऋषि मार्कण्डेय के नित्य स्मरण के लिए भी कहा जाता है।

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